The Prevention of Corruption Act, 1988

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This document is the Prevention of Corruption Act, 1988, which consolidates and amends the law relating to prevention of corruption and matters connected therewith. It defines ‘public duty’ and ‘public servant’ broadly, encompassing individuals in government service, those performing public duties, and those associated with corporations or bodies receiving government aid. The act introduces special judges for trying corruption offenses, with provisions for speedy trials and appeals. It outlines various offenses related to bribery, obtaining undue advantage, and criminal misconduct by public servants. The act also addresses the role of commercial organizations in corruption, providing for penalties and procedures for their involvement. Furthermore, it details the investigation of corruption cases, the requirement for prior sanction for prosecution, and the presumption of guilt under certain circumstances. The document also includes provisions for habitual offenders, attempts, and the determination of fines. It repeals the Prevention of Corruption Act, 1947, and the Criminal Law Amendment Act, 1952.

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भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988

(1988 का अधिनियम संख्यांक 49)

[9 सितंबर, 1988]

भ्रष्टाचार निवारण से संबंधित विधि का समेकन और संशोधन करने तथा उसमें संबंधित विषयों के लिए अधिनियम

भारत गणराज्य के उनतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

  1. संक्षिप्त नाम और विस्तार—(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 है।
    (2) इसका विस्तार ${ }^{\text {**** }}$ संपूर्ण भारत पर है और यह भारत के बाहर भारत के समस्त नागरिकों को भी लागू है।
  2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—
    (क) “निर्वाचन” से संसद् या किसी विधान-मंडल, स्थानीय प्राधिकरण या अन्य लोक प्राधिकरण के सदस्यों के चयन के प्रयोजन के लिए किसी विधि के अधीन, किसी भी माध्यम से, कराया गया निर्वाचन अभिप्रेत है ;
    ${ }^{2}[($ कक) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है तदनुसार “विहित” पर का अर्थ लगाया जाएगाः]
    (ख) “लोक कर्तव्य” से अभिप्रेत है वह कर्तव्य; जिसके निर्वहन में राज्य, जनता या समस्त समुदाय का हित है।
    स्पष्टीकरण-इस खंड में, “राज्य” के अंतर्गत किसी केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन या सरकार से सहायता प्राप्त कोई प्राधिकरण या निकाय या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कंपनी भी है ;
    (ग) “लोक सेवक” से अभिप्रेत है,—
    (i) कोई व्यक्ति जो सरकार की सेवा या उसके वेतन पर है या किसी लोक कर्तव्य के पालन के लिए सरकार से फीस या कमीशन के रूप में पारिश्रमिक पाता है ;
    (ii) कोई व्यक्ति जो किसी लोक प्राधिकरण की सेवा या उसके वेतन पर है ;
    (iii) कोई व्यक्ति जो किसी केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन या सरकार से सहायता प्राप्त किसी प्राधिकरण या निकाय या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित किसी सरकारी कंपनी की सेवा या उसके वेतन पर है ;
    (iv) कोई न्यायाधीश, जिसके अंतर्गत ऐसा कोई व्यक्ति है जो किन्हीं न्यायनिर्णयन कृत्यों का, चाहे स्वयं या किसी व्यक्ति के निकाय के सदस्य के रूप में, निर्वहन करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया है ;
    (v) कोई व्यक्ति जो न्याय प्रशासन के संबंध में किसी कर्तव्य का पालन करने के लिए न्यायालय द्वारा प्राधिकृत किया गया है, जिसके अंतर्गत किसी ऐसे न्यायालय द्वारा नियुक्त किया गया परिसमापक, रिसीवर या आयुक्त भी है ;
    (vi) कोई मध्यस्थ या अन्य व्यक्ति जिसको किसी न्यायालय द्वारा या किसी सक्षम लोक प्राधिकरण द्वारा कोई मामला या विषय विनिश्चय या रिपोर्ट के लिए निर्देशित किया गया है ;
    (vii) कोई व्यक्ति जो किसी ऐसे पद को धारण करता है जिसके आधार पर वह निर्वाचक सूची तैयार करने, प्रकाशित करने, बनाए रखने या पुनरीक्षित करने अथवा निर्वाचन या निर्वाचन के भाग का संचालन करने के लिए सशक्त है ;

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स्पष्टीकरण 2—”लोक सेवक” शब्द जहां भी आए हैं, वे उस हर व्यक्ति के संबंध में समञ्ज जाएंगे जो लोक सेवक के ओहदे को वास्तव में धारण किए हों, चाहे उस ओहदे को धारण करने के उसके अधिकार में कैसी ही विधिक त्रुटि हो।

अध्याय 2

विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति

  1. विशेष न्यायाधीश नियुक्त करने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निम्नलिखित अपराधों के विचारण के लिए इतने विशेष न्यायाधीश नियुक्त कर सकेगी, जितने ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए या ऐसे मामलों या मामलों के समूह के लिए जो आवश्यक हों अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, अर्थात् :-
    (क) इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध ; और
    (ख) खंड (क) में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी को रोकने के लिए पड्यंत्र करने या करने का प्रयत्न या कोई दुप्प्रेरण।
    (2) कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश या सहायक सेशन न्यायाधीश नहीं है या नहीं रहा है।
  2. विशेष न्यायाधीशों द्वारा विचारणीय मामले-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध विशेष न्यायाधीश द्वारा ही विचारणीय होंगे।

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परंतु जहां विचारण उक्त अवधि के भीतर पूरा नहीं हो पाता है, वहां विशेष न्यायाधीश ऐसा न हो पाने के कारणों को लेखबद्ध करेगा :

परंतु यह और कि उक्त अवधिको, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, एक समय में छह माह से अनधिक आगे और अवधि के लिए विस्तारित किया जा सकेगा, तथापि उक्त अवधि, विस्तारित अवधि सहित सामान्य रूप से कुल मिलाकर चार वर्ष से अधिक नहीं होगी।]
5. प्रक्रिया और विशेष न्यायाधीश की शक्तियां—(1) विशेष न्यायाधीश अभियुक्त के विचारणार्थ सुपुर्द किए गए बिना भी अपराधों का संज्ञान कर सकता है, और वह अभियुक्त व्यक्ति के विचारण में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में मजिस्ट्रेटों द्वारा बारंट के मामलों के लिए विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।
(2) विशेष न्यायाधीश किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से जिसका प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: किसी अपराध से संपृक्त होना या संसर्गी होना अनुमित है, विशेष न्यायाधीश ऐसे व्यक्ति और प्रत्येक अन्य संपृक्त व्यक्ति को, चाहे वह उस अपराध के किए जाने में मुख्य रहा हो या दुष्प्रेरक रहा हो उसके अपराध से संबंधित अपनी जानकारी की सभी परिस्थितियों का पूर्ण और सत्य प्रकटन करने की शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है और इस प्रकार दी गई क्षमा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 308 की उपधारा (1) से (5) के प्रयोजनों के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 307 के अधीन प्रदत्त की गई समझे जाएगी।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में यथा उपबंधित के सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध जहां तक वे इस अधनियम से असंगत नहीं हैं, विशेष न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे; और उक्त उपबंधों के प्रयोजनार्थ, विशेष न्यायाधीश का न्यायालय सेशन न्यायालय समझा जाएगा और विशेष न्यायाधीश के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाला व्यक्ति लोक अभियोजक समझा जाएगा।
(4) विशिष्टतया, और उपधारा (3) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 320 और धारा 475 के उपबंध, जहां तक हो सके, विशेष न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाही को लागू होंगे, और उक्त उपबंधों के प्रयोजनार्थ विशेष न्यायाधीश मजिस्ट्रेट समझा जाएगा।
(5) विशेष न्यायाधीश उसके द्वारा दोषसिद्ध व्यक्ति को कोई भी दंडादेश दे सकता है जो उस अपराध के लिए जिसके लिए ऐसे व्यक्ति दोषसिद्ध हैं, विधि द्वारा प्राधिकृत है।
(6) इस अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराधों का विचारण करते समय विशेष न्यायाधीश दंड विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का अध्यादेश संध्याक 38) के अधीन जिला न्यायाधीश द्वारा प्रयोक्तव्य सभी सिविल शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करेगा।
6. संक्षिप्तत: विचारण करने की शक्ति—(1) जहां कोई विशेष न्यायाधीश धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट ऐसे अपराध का विचारण करता है जो आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (1955 का 10) की धारा 12क की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी विशेष आदेश, या उस धारा की उपधारा (2) के खंड (क) में निर्दिष्ट आदेश के उल्लंघन की बाबत किसी लोक सेवक द्वारा किया जाना अभिकचित है, वहां इस अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (1) में या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 260 में किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायाधीश अपराध का संक्षिप्त रूप में विचारण करेगा, और उक्त संहिता की धारा 262 से धारा 265 (जिसमें वे दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) के उपबंध, यथाशक्य ऐसे विचारण को लागू होंगे :

परंतु इस धारा के अधीन किसी संक्षिप्त विचारण में किसी दोषसिद्धि की दशा में, विशेष न्यायाधीश के लिए एक वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास का दंडादेश पारित करना विधिपूर्ण होगा :

परंतु यह और कि इस धारा के अधीन जब किसी संक्षिप्त विचारण के प्रारंभ पर या उसके अनुक्रम में, विशेष न्यायाधीश को यह प्रतीत होता है कि मामले की प्रकृति ऐसी है कि एक वर्ष से अधिक के कारावास का दंडादेश पारित करना पड़ सकता है या, किसी अन्य कारण से, मामले का संक्षिप्त रूप से विचारण करना अवांछनीय है तब विशेष न्यायाधीश, पक्षकारों की सुनवाई के पश्चात्,

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अध्याय 3

अपराध और शास्तियां

17. लोक सेवक को रिश्वत दिए जाने से संबंधित—ऐसा कोई लोक सेवक जो,—

(क) या तो स्वयं या किसी अन्य लोक सेवक द्वारा अनुचित रूप से या बेईमानी से लोक कर्तव्य का पालन करने या पालन करवाने या ऐसे कर्तव्य से प्रविरत रहने या प्रविरत करवाने के आशय से किसी व्यक्ति से, कोई असम्यक् लाभ अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा; या
(ख) या तो स्वयं या किसी अन्य लोक सेवक द्वारा, किसी लोक कर्तव्य का अनुचित रूप से या बेईमानी से, पालन करने के लिए या ऐसे कर्तव्य के पालन से प्रविरत रहने के लिए किसी इनाम के रूप में किसी व्यक्ति से कोई असम्यक् लाभ अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा; या
(ग) किसी व्यक्ति से कोई असम्यक् लाभ प्रतिगृहीत करने की प्रत्याशा में या उसके परिणामस्वरूप किसी लोक कर्त्तव्य का अनुचित रूप से या बेईमानी से पालन करेगा या ऐसे कर्त्तव्य का पालन करने से प्रविरत रहेगा या किसी अन्य लोक सेवक को अनुचित रूप से या बेईमानी से पालन करने के लिए उत्प्रेरित करेगा,
वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

स्पष्टीकरण 1—इस धारा के प्रयोजन के लिए, किसी असम्यक् लाभ को अभिप्राप्त करेगा, प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा, से ही अपराध का गठन होगा यद्यपि लोक सेवक द्वारा लोक कर्तव्य का पालन अनुचित न हो या न रहा हो।

दृष्टांत—एक लोक सेवक ‘एस’ एक व्यक्ति, ‘पी’ से उसके नेमी राशन कार्ड आवेदन को समय कसे प्रक्रिया में लाने के लिए पांच हजार रुपए की रकम देने को कहता है। ‘एस’ इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है।

स्पष्टीकरण 2—इस धारा के प्रयोजन के लिए,—
(i) “अभिप्राप्त करेगा” या “प्रतिगृहीत करेगा” या “अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा” पदों में ऐसे मामले सम्मिलित होंगे, जहां ऐसा कोई व्यक्ति जो लोक सेवक होते हुए, स्वयं के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए लोक सेवक के रूप में अपने पद का दुरुपयोग करके या किसी अन्य लोक सेवक पर अपने वैयक्तिक असर का प्रयोग करके का किन्हीं अन्य भ्रष्ट या अवैध साधनों के द्वारा कोई असम्यक् लाभ अभिप्राप्त करता है या “प्रतिगृहित करता है” या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करता है;
(ii) इस बात का कोई महत्व नहीं होगा कि ऐसा व्यक्ति लोक सेवक होते हुए असम्यक् लाभ सीधे या अन्य व्यक्ति के माध्यम से अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा।

7क. लोक सेवक पर भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा या वैयक्तिक असर का प्रयोग करके असम्यक् लाभ लेना-जो, कोई अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई असम्यक् लाभ, किसी लोक सेवक को, भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा या अपने वैयक्तिक असर के प्रयोग द्वारा इस बात के लिए उत्प्रेरित करने हेतु या इनाम के रूप में किसी अन्य व्यक्ति से प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा कि वह लोक सेवक अनुचित रूप से या बेईमानी से लोक कर्त्तव्य का पालन करे या पालन करवाए या ऐसा लोक सेवक, ऐसा लोक कर्तव्य करने से प्रविरत रहे या किसी अन्य लोक सेवक को ऐसे लोक कर्त्तव्य का पालन करने से प्रविरत रखे, वह कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्षसे कम की नहींहोगी किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।
8. किसी लोक सेवक को रिश्वत दिए जाने से संबंधित अपराध—ऐसा कोई व्यक्ति जो—
(i) किसी लोक सेवक को कोई लोक कर्तव्य का अनुचित रूप से पालन करने हेतु उत्प्रेरित करने के आशय से; या

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परन्तु इस धारा के उपबंधवहां लागू नहीं होंगे जहां किसी व्यक्ति को ऐसा असम्यक् लाभ देने के लिए विवश किया गया है;
परंतु यह और कि इस प्रकार विवश व्यक्ति ऐसा असम्यक् लाभ देने की तारीख से सात दिन की अवधि के भीतर इस मामले की रिपोर्ट विधि का प्रवर्तन करने वाले प्राधिकारी या अन्वेषण अभिकरण को देगा :

परंतु यह भी कि जहां इस धारा के अधीन अपराध किसी वाणिज्यिक संगठन द्वारा किया गया है वहां ऐसा वाणिज्यिक संगठन जुर्माने से दंडनीय होगा।

दृष्टांत—कोई व्यक्ति, ‘पी’ लोक सेवक, ‘एम’ को, यह सुनिश्चित करने के लिए दस हजार रुपए की रकम देता है कि अन्य सभी बोली लगाने वालों में से उसे अनुज्ञप्ति प्रदान की जाए। ‘पी’ इस उपधारा के अधीन अपराध का दोषी है।

स्पष्टीकरण—इस बात का कोई महत्व नहीं होगा कि वह व्यक्ति, जिसे असम्यक् लाभ दिया गया है या देने का वचन दिया गया है वही व्यक्ति है जिस व्यक्ति ने संबंधित लोक कर्तव्य करना है या किया है और इस बात का भी कोई महत्व नहीं होगा कि ऐसा असम्यक् लाभ उस व्यक्ति को सीधे या किसी अन्य पक्षकार के माध्यम से पहुंचाया गया है या पहुंचाने का वचन दिया गया है।

यदि वह व्यक्ति, ऐसे विधि प्रवर्तन प्राधिकारी या अन्वेषण अभिकरण को पश्चात्क्ती के विरुद्ध अभिकचित अपराध के उसके अन्वेषणमें सहायता करने के लिए, उस विधि प्रवर्तन प्राधिकारी या अन्वेषण अभिकरण को सूचना देने के पश्चात् किसी अन्य व्यक्ति को कोई असम्यक् लाभ देता है या देने का वचन देता है।
9. किसी वाणिज्यिक संगठन द्वारा किसी लोक सेवक को रिश्वत देने से संबंधित अपराध—(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी वाणिज्यिक संगठन द्वारा किया गया है, वहां ऐसा संगठन जुर्माने से दंडनीय होगा, यदि ऐसे वाणिज्यिक संगठन से सहबद्ध कोई व्यक्ति किसी :-
(क) ऐसे वाणिज्यिक संगठन के लिए कारबार अभिप्राप्त करनेया प्रतिधारित करने के आशय से; या
(ख) ऐसे वाणिज्यिक संगठन के लिए कारबार के संचालनमें कोई लाभ अभिप्राप्त करने या प्रतिधारित करने के आशय से :

परन्तु वाणिज्यिक संगठन के लिए यह साबित करने हेतु एक बचाव होगा कि किसी लोक सेवक को कोई असम्यक् लाभ देता है या देने का वचन देता है कि उसने उससे सहयोजित व्यक्तियों को ऐसा आचरण करने से निवारित करने के लिए उसने ऐसे मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुपालन में, जो विहित किए जाएं, पर्याप्त प्रक्रियाएं अपना रखी थीं।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में यह तब कहा जाएगा कि उसने किसी लोक सेवक को असम्यक् लाभ दिया है, यदि उसने अभिकचित रूप से धारा 8 के अधीन अपराध किया है, चाहे ऐसे व्यक्ति को ऐसे किसी अपराध के लिए, अभियोजित किया गया हो अथवा नहीं।
(3) धारा 8 और इस धारा के प्रयोजनों के लिए,—
(क) “वाणिज्यिक संगठन” से निम्नलिखित अभिप्रेत है-
(i) ऐसा कोई निकाय, जो भारत में निगमित किया जाता है और भारत में या भारत के बाहर कोई कारबार करता है;
(ii) ऐसा कोई अन्य निकाय, जो भारत के बाहर निगमित किया जाता है और जो भारत के किसी भी भाग में कोई कारबार या कारबार का कोई भाग करता है;
(iii) ऐसी भागीदारी फर्म या कोई व्यक्ति-संगम जो भारत में बनाया गया है और जो भारत में या भारत के बाहर कोई कारबार करता है; या
(iv) ऐसी कोई अन्य भागीदारी फर्म या व्यक्ति-संगम, जो भारत के बाहर बनाया जाता है और जो भारत के किसी भाग में कोई कारबार या कारबार का कोई भाग करता है;
(ख) “कारबार” के अंतर्गत कोई व्यापार या वृत्ति या सेवा, उपलब्ध करता है;
(ग) किसी व्यक्ति को वाणिज्यिक संगठन से उस दशा में सहयोजित कहा जाएगा, यदि ऐसा व्यक्ति, ऐसा कोई असम्यक् लाभ जिसमे उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध गठित होता है, देने का वचन दिए जाने या ऐसा कोई लाभ दिए जाने पर ध्यान न देते हुए वाणिज्यिक संगठन के लिए या उसकी ओर से कोई सेवाएं करता है।स्पष्टीकरण 1—वह हैसियत जिसमें व्यक्ति वाणिज्यिक संगठन के लिए या उसकी ओर से सेवाएं करता है, इस बात के होते हुए भी कि ऐसा व्यक्ति ऐसे संगठन का कर्मचारी या अभिकर्ता या समनुपंगी है, विचार का विषय नहीं होगी।

स्पष्टीकरण 2—इस बात का अवधारणा कि वह व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है या नहीं जो वाणिज्यिक संगठन के लिए या उसकी आरे से सेवाएं करता है, सभी सुसंगत परिस्थितियों के प्रति निर्देश करके किया जाएगा न कि केवल उस व्यक्ति और वाणिज्यिक संगठन के बीच के संबंध की प्रकृति के प्रति निर्देश करके।

स्पष्टीकरण 3—यदि वह व्यक्ति वाणिज्यिक संगठन का कोई कर्मचारी है तो जब तक प्रतिकूल साबित न किया जाए वह उपधारणा की जाएगी कि वह व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जो वाणिज्यिक संगठन के लिए या उसकी ओर सेवाएं करता है।
(4) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा 7क, धारा 8 और इस धारा के अधीन का अपराध संज्ञेय होगा।
(5) केन्द्रीय सरकार, संबद्ध विभागों सहित संबद्ध पणधारियोंके परामर्श से और वाणिज्यिक संगठनोंसे सहयुक्त व्यक्तियों द्वारा किसी व्यक्ति को, जो लोक सेवक है, रिश्वत देने से निवारित करने के विचार से ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों को विहित करेगी, जो आवश्यक समझे और जो ऐसे संगठनों द्वारा अनुपालन हेतु स्थापित किए जा सकते हैं।
10. वाणिज्यिक संगठन के भारसाधक व्यक्ति का अपराध का दोषी होना—जहां धारा 9 के अधीन कोई अपराध किसी वाणिज्यिक संगठन द्वारा किया जाता है और न्ययालय में ऐसे अपराध का वाणिज्यिक संगठन के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया जाना साबित हो जाता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी उस अपराध का दोषी होगा और वह अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने का दायी होगा तथा कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

स्पष्टीकरण 1—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी फर्म के संबंध में “निदेशक” से फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है।]
11. लोक सेवक, जो ऐसे लोक सेवक द्वारा की गई कार्यवाही या कारबार से संबद्ध व्यक्ति से, प्रतिफल के बिना, 1[असम्मक् लाभ] अभिप्राप्त करता है-जो कोई लोक सेवक होते हुए, अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए, किसी व्यक्ति से यह जानते हुए कि ऐसे लोक सेवक द्वारा की गई या की जाने वाली किसी कार्यवाही या कारबार से वह व्यक्ति संपृक्त रह चुका है, या है या उसका संपृक्त होना संभाव्य है, या स्वयं उसके या किसी ऐसे लोक सेवक के, जिसका वह अधीनस्थ है, 1[पदीय कृत्यों या लोक कर्तव्य] से वह व्यक्ति संपृक्त है, अथवा किसी ऐसे व्यक्ति से यह जानते हुए हुए कि वह इस प्रकार संपृक्त व्यक्ति से हितबद्ध है या नातेदारी रखता है, किसी 1[असम्मक् लाभ] को किसी प्रतिफल के बिना, या ऐसे प्रतिफल के लिए, जिसे वह जानता है, कि अपर्याप्त है, प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त करेगा, 2*** या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम नहीं होगी किंतु पांच वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, दंडित किया जाएगा।
${ }^{3}$ [12. अपराधों के दुष्प्रेरणा के लिए दंड-जो कोई, इस अधिनियमके अधीन दंडनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरणा करेगा, चाहे वह अपराध उस दुष्प्रेरणा के परिणामस्वरूप किया गया हो अथवा नहीं, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।]
13. लोक सेवक द्वारा आपराधिक अवचार-4(1) कोई लोक सेवक आपराधिक अवचार का अपराध करने वाला कहा जाएगा,—
(क) यदि वह लोक सेवक के रूप में अपने को सौंपी गई किसी संपत्ति या अपने नियंत्रणाधीन किसी संपत्ति का अपने उपयोग के लिए बेईमानी से या कपटपूर्वक दुर्विनियोग करता है या उसे अन्यथा संपरिवर्तित कर लेता है या किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा करने देता है; या
(ख) यदि वह अपनी पदावधि के दौरान अवैध रूप से अपने आशय को समृद्ध करता है।
स्पष्टीकरण 1—किसी व्यक्ति के बारे में यह उपधारणा की जाएगी कि उसने अवैध रूप से अपने को साशय समृद्ध बनाया है, यदि वह या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति अपनी पदावधि के दौरान किसी समय अपनी आय के ज्ञात स्त्रोतों से अननुपातिक धनीय संसाधन या संपत्ति उसके कब्जे में है या रही है, जिसके लिए लोक सेवक समाधानप्रद रूप से हिसाब नहीं दे सकता है।

स्पष्टीकरण 2—”आय के ज्ञात स्त्रोत” पद से किसी विधिपूर्ण स्त्रोत से प्राप्त आय अभिप्रेत है।]
(2) कोई लोक सेवक जो आपराधिक अवचार करेगा इतनी अवधि के लिए, जो 1[चार वर्ष] से कम की न होगी किंतु जो 3[दस वर्ष] तक की हो सकेगी, कारावास से दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

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अध्याय 4

इस अधिनियम के अधीन मामलों का अन्वेषण

  1. अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति—दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, निम्नलिखित की पंक्ति से नीचे का कोई भी पुलिस अधिकारी,-
    (क) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन की दशा में, पुलिस निरीक्षक ;
    (ख) मुंबई, कलकत्ता, मद्रास और अहमदाबाद के महानगरीय क्षेत्रों में, और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन इस रूप में अधिसूचित किसी अन्य क्षेत्र में, सहायक पुलिस आयुक्त ;
    (ग) अन्याय, उप पुलिस अधीक्षक, या समतुल्य रैंक का पुलिस अधिकारी ; इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अन्वेषण, यथास्थिति, महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना, अथवा उसके लिए कोई गिरफ्तारी, वारंट के बिना, नहीं करेगा :

परंतु यदि कोई पुलिस अधिकारी जो पुलिस निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत है तो वह भी ऐसे किसी अपराध का अन्वेषण, यथास्थिति, महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना, अथवा उसके लिए गिरफ्तारी वारंट के बिना, कर सकेगा :

परंतु यह और कि धारा 13 की ‘[उपधारा (1) के खंड (ख)] में निर्दिष्ट किसी अपराध का अन्वेषण ऐसे पुलिस अधिकारी के आदेश के बिना नहीं किया जाएगा जो पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो।
‘[17क. लोक सेवक द्वारा उसके शासकीय कृत्यों या कर्त्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या लिए गए विनिश्चय के संबंध में अपराधों की जांच या पूछताछ या अन्वेषण—कोई पुलिस अधिकारी, किसी ऐसे अपराध में कोई जांच या पूछताछ या अन्वेषण, जिसे इस अधिनियम के अधीन लोक सेवक द्वाराअभिकचित रूप से कारित किया गया है, वहां ऐसा अभिकचित अपराध ऐसे लोक सेवक द्वारा उसके पदीय कृत्यों या कर्त्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या लिए गए विनिश्चय से संबंधित है,-
(क) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो उस समय जब वह अपराध अभिकचित रूप से किया गया था, संघ के कार्यों के संबंध में नियोजित है या था, उस सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं करेगा;
(ख) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो उस समय जब वह अपराध अभिकचित रूप से किया गया था, किसी राज्य के कार्यों के संबंध में नियोजित है या था, उस सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं करेगा;
(ग) किसी अन्य व्यक्ति की दशा में, उस समय जब वह अपराध अभिकचित रूप से किया गया था, उसे उसके पद से हटाने के लिए सक्षम प्राधिकारी के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं करेगा :
परन्तु ऐसा कोई अनुमोदन किसीव्यक्ति को अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए असम्यक् लाभ प्रतिगृहीत करने या प्रतिगृहीत करने का प्रयत्न करने के आरोप पर घटनास्थल पर ही गिरफ्तार करने संबंधी मामले में आवश्यक नहीं होगा :

परंतु यह और कि संबद्ध प्राधिकारी इस धारा के अधीन अपने विनिश्चय की सूचना तीन मास की अवधि के भीतर देगा, जिसे लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से उस प्राधिकारी द्वारा एक मास की और अवधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा।]

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परंतु किसी व्यक्ति के लेखाओं के संबंध में इस उपधारा के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से नीचे के किसी पुलिस अधिकारी द्वारा नहीं किया जाएगा जब तक कि वह पुलिस अधीक्षक की पंक्ति के या उससे ऊपर के किसी पुलिस अधिकारी द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से प्राधिकृत न कर दिया गया हो।

स्पष्टीकरण—इस धारा में “बैंक” और “बैंककार बही” पदों के वे ही अर्थ होंगे जो बैंककार बही साक्ष्य अधिनियम, 1891 (1891 का 18) में हैं।

‘|अध्याय 4क

संपत्ति की कुर्की और समपहरण

18क. दांडिक विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 के उपबंधों का इस अधिनियम के अधीन कुर्की को लागू होना—धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (2002 का 15) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, दांडिक विधि संशोधन अधिनियम, 1994 (1994 का अध्यादेश सं 38) के उपबंध, जहां तक हो सके, इस अधिनियम के अधीन कुर्की, कुर्क की गई संपत्ति के प्रशासन और कुर्की के आदेश के निष्पादन या धन के अधिहरण या आपराधिक उपायों द्वारा उपाप्त की गई संपत्ति को लागू होंगे।
(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, दांडिक विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का अध्यादेश सं० 38) के उपबंध इस उपांतरण के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगेकि “जिला न्यायाधीश” के प्रति निर्देश का “विशेष न्यायाधीश” के प्रति निर्देश के रूप में अर्थान्वयन किया जाएगा।]

अध्याय 5

अभियोजन के लिए मंजूरी और अन्य प्रकीर्ण उपबंध

  1. अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी का आवश्यक होना-(1) कोई न्यायालय ?|धारा 7, धारा 11, धारा 13 और धारा 15] के अधीन दंडनीय किसी ऐसे अपराध का संज्ञान, जिसकी बाबत वह अभिकचित है कि वह लोक सेवक द्वारा किया गया है, ?|जैसा लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (2014 का अधिनियम संख्यांक 1) में अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय] निम्नलिखित की पूर्व मंजूरी के बिना नहीं करेगा-
    (क) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो संघ के मामलों के संबंध में, ?[यथास्थिति, नियोजित है या अभिकचित अपराध के किए जाने के समय नियोजित था] और जो अपने पद से केंद्रीय सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी से हटाए जाने के सिवाय नहीं हटाया जा सकता है, केंद्रीय सरकार ;
    (ख) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो राज्य के मामलों के संबंध में ?[यथास्थिति, नियोजित है या अभिकचित अपराध किए जाने के समय नियोजित था] और जो अपने पद से राज्य सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी से हटाए जाने के सिवाय नहीं हटाया जा सकता है, केंद्रीय सरकार ;
    (ग) किसी अन्य व्यक्ति की दशा में, उसे उसके पद से हटाने के लिए, सक्षम प्राधिकारी :
    ?|परंतु किसी पुलिस अधिकारी या किसी अन्वेषक अभिकरण के किसी अधिकारी या अन्य विधि प्रवर्तन प्राधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा इस उपधारा में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी अपराध का न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए जाने के लिए ऐसी सरकार या ऐसे प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के लिए, यथास्थिति, समुचित सरकार या सक्षम प्राधिकारी को कोई अनुरोध तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि-
    (i) ऐसे व्यक्ति ने ऐसे अभिकचित अपराधों के बारे में, जिनके लिए लोक सेवक को अभियोजित किए जाने की ईप्सा की गई है, किसी सक्षम न्यायालय में कोई परिवाद फाइल न किया हो; और

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परंतु यह और कि किसी पुलिस अधिकारी या किसी अन्वेषक अभिकरण के किसी अधिकारी या अन्य विधि प्रवर्तन प्राधिकारी से भिन्न व्यक्ति से अनुरोध प्राप्त होने की दशा में, समुचित सरकार या सक्षमप्राधिकारी, संबद्ध लोक सेवक को सुने जाने का अवसर प्रदान किए बिना किसी लोक सेवक को अभियोजित करने के लिए मंजूरी नहीं देगा :

परंतु यह भी कि समुचित सरकार या कोई सक्षमप्राधिकारी, इस उपधारा के अधीन किसी लोक सेवक के अभियोजन के लिए मंजूरी की अपेक्षा करने वाले प्रस्ताव की प्राप्ति के पश्चात्, उसकी प्राप्ति की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर उस प्रस्ताव पर अपना विनिश्चय देने का प्रयास करेगा :

परंतु यह भी कि उस दशा में जहां अभियोजन हेतु मंजूरी देने के प्रयोजन के लिए कोई विधिक परामर्श अपेक्षितहै, वहां ऐसी अवधि को लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से एक मास की और अवधि के लिए विस्तारित किया जा सकेगा।

परंतु यह भी कि केन्द्रीय सरकार किसी लोक सेवक के अभियोजन हेतु मंजूरी देने के प्रयोजन के लिए ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांत विहित कर सकेगी, जो वह आवश्यक समझे।

स्पष्टीकरण—उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, “लोक सेवक” पद में ऐसा व्यक्ति सम्मिलित है,—
(क) जो उस अवधि के दौरान, जिसमें अभिकवितरूप से अपराध किया गया है, पद धारण करने से प्रविरत हो गया था; या
(ख) जो उस अवधि के दौरान, जिसमें अभिकवित रूप से अपराध किया गया है, पद धारण करने से प्रविरतहो गया था और वह उस पद से भिन्न कोई अन्य पद धारण किए हुए था, जिसके दौरान अभिकवित रूप से अपराध किया गया है।]
(2) जहां किसी भी कारणवश इस बाबत शंका उत्पन्न हो जाए कि उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित पूर्व मंजूरी केंद्रीय या राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी में से किसके द्वारा दी जानी चाहिए वहां ऐसी मंजूरी उस सरकार या प्राधिकारी द्वारा दी जाएगी जो लोक सेवक को उसके पद से उस समय हटाने के लिए सक्षम था जिस समय अपराध का किया जाना अभिकवित है।
(3) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी,—
(क) विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित कोई निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश किसी न्यायालय द्वारा अपील, पुष्टिकरण या पुनरीक्षण में, अभियोजन के लिए उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित मंजूरी के न होने या उसमें कोई त्रुटि, लोप या अनियमितता होने के आधार पर तब तक नहीं उलटा या परिवर्तित किया जाएगा जब तक कि न्यायालय की राय में उसके कारण वास्तव में कोई अन्याय हुआ है ;
(ख) कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों को किसी प्राधिकारी द्वारा दी गई मंजूरी में किसी त्रुटि, लोप या अनियमितता के आधार पर तब तक नहीं रोकेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता कि ऐसी त्रुटि, लोप या अनियमितता के परिणामस्वरूप अन्याय हुआ है ;
(ग) कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य आधार पर कार्यवाहियां नहीं रोकेगा और कोई न्यायालय किसी जांच, विचारण, अपील या अन्य कार्यवाही में पारित किसी अंर्तवर्ती आदेश के संबंध में पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग नहीं करेगा।
(4) उपधारा (3) के अधीन यह अवधारित करने में कि ऐसी मंजूरी के न होने से या उसमें किसी त्रुटि, लोप या अनियमितता के होने से कोई अन्याय हुआ या परिणामित हुआ है या नहीं, न्यायालय इस तथ्य को ध्यान में रखेगा कि क्या कार्यवाहियों के किसी पूर्वतर प्रक्रम पर आक्षेप किया जा सकता था और किया जाना चाहिए था या नहीं।

स्पष्टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए,—
(क) त्रुटि के अंतर्गत मंजूरी देने वाले प्राधिकारी की सक्षमता भी है ;
(ख) अभियोजन के लिए अपेक्षित मंजूरी के अंतर्गत इस अपेक्षा के प्रति निर्देश भी है कि अभियोजन किसी विनिर्दिष्ट प्राधिकारी की ओर से, या किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति की मंजूरी से होगा या समतुल्य प्रकृति की कोई अपेक्षा भी है।
‘[20. जहां लोक सेवक कोई असम्यक् लाभ प्रतिगृहीत करता है वहां उपधारणा—जहां धारा 7 के अधीन या धारा 11 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के किसी विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त लोक सेवक ने किसी व्यक्ति से कोई असम्यक् लाभ अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त किया है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न किया है, वहां जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए यह उपधारणा की जाएगी की उसने, यथास्थिति या तो स्वयं उसके

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परंतु-
(क) साक्षी के रूप में वह अपनी प्रार्थना पर के सिवाय आहूत नहीं किया जाएगा ;
(ख) साक्ष्य देने में उसकी असफलता पर अभियोजन पक्ष कोई टीका-टिप्पणी नहीं करेगा अथवा इससे उसके या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई उपधारणा उत्पन्न नहीं होगी ;
(ग) कोई ऐसा प्रश्न जिसकी प्रवृत्ति यह दर्शित करने की है कि जिस अपराध का आरोप उस पर लगाया गया है उससे भिन्न, अपराध उसने किया है या वह उसके लिए सिद्धदोष हो चुका है, या वह बुरे चरित्र का है, उससे उस दशा में के सिवाय न पूछा जाएगा या पृथे जाने पर उसका उत्तर देने की उससे अपेक्षा नहीं की जाएगी जिसमें-
(i) इस बात का सबूत कि उसने ऐसा अपराध किया है या उसके लिए वह सिद्धदोष हो चुका है, यह दर्शित करने के लिए ग्राह्य साक्ष्य है कि वह उस अपराध का दोषी है जिसका आरोप उस पर लगाया गया है, या
(ii) उसने स्वयं या अपने प्लीडर द्वारा अभियोजन पक्ष के किसी साक्षी से अपना अच्छा चरित्र सिद्ध करने की दृष्टि से कोई प्रश्न पूछा है या अपने अच्छे चरित्र का साक्ष्य दिया है अथवा प्रतिरक्षा का स्वरूप या संचालन इस प्रकार का है कि उसमें अभियोजक के या अभियोजन पक्ष के लिए किसी साक्षी के चरित्र पर लांछन अंतर्गत है, या
(iii) उसने उसी अपराध से आरोपित किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य दिया है।
22. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का कुछ उपांतरणों के अध्यक्षीन लागू होना—दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के संबंध में किसी कार्यवाही पर लागू होने में ऐसे प्रभावी होंगे मानो-
(क) धारा 243 की उपधारा (1) में “तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी” शब्दों के स्थान पर “तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी कि वह तुरंत या इतने समय के भीतर जितना न्यायालय अनुजात करे, उन व्यक्तियों की (यदि कोई हों) जिनकी वह अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा करना चाहता है और उन दस्तावेजों की (यदि कोई हों) जिन पर वह निर्भर करना चाहता है, एक लिखित सूची दे, और तब उससे अपेक्षा की जाएगी” शब्द प्रतिस्थापित कर दिए गए हों ;
(ख) धारा 309 की उपधारा (1) में, तीसरे परंतुक के पश्चात्, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया गया था, अर्थात् :-
“परंतु यह और कि कार्यवाही मात्र इस आधार पर कि कार्यवाही के एक पक्षकार द्वारा धारा 307 के अधीन आवेदन किया गया है, स्थगित या मुल्तवी नहीं की जाएगी।”;
(ग) धारा 317 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की गई थी, अर्थात् :-
“(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी न्यायाधीश, यदि वह ठीक समझता है तो और ऐसे कारणों से जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, अभियुक्त या उसके प्लीडर की अनुपस्थिति में जांच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और किसी साक्षी का साक्ष्य, प्रतिपरीक्षा के लिए साक्षी को पुन: बुलाने के अभियुक्त के अधिकार के अधीन रहते हुए, लेखबद्ध कर सकता है।”;
(घ) धारा 397 की उपधारा (1) में स्पष्टीकरण के पहले निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित कर दिया गया हो, अर्थात् :-“परंतु जहां किसी न्यायालय द्वारा इस उपधारा के अधीन शक्तियों का प्रयोग ऐसी कार्यवाहियों के किसी एक पक्षकार द्वारा किए गए आवेदन पर किया जाता है, वहां वह न्यायालय कार्यवाही के अभिलेख को मामूली तौर पर—
(क) दूसरे पक्षकार को इस बात का हेतुक दर्शित करने का अवसर दिए बिना नहीं मंगाएगा कि अभिलेख क्यों न मंगाया जाए ; या
(ख) उस दशा में नहीं मंगाएगा जिसमें उसका यह समाधान हो जाता है कि कार्यवाही के अभिलेख की परीक्षा प्रमाणित प्रतियों से की जा सकती है।”।
23. ‘[धारा 13(1)(क)] के अधीन अपराध के संबंध में आरोप की विशिष्टियां—दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, जब किसी अपराधी पर धारा 13 की उपधारा (1) के ‘[खंड (क)] के अधीन किसी बात का आरोप है, तब उसे आरोप में उस संपत्ति को, जिसके संबंध में अपराध का किया जाना अभिकचित है और उन तारीखों को जिनके बीच अपराध का किया जाना अभिकचित है, विशिष्ट मदों या निश्चित तारीख को विनिर्दिष्ट किए बिना, वर्णित करना पर्याप्त होगा और इस प्रकार विरचित आरोप उक्त संहिता की धारा 219 के अर्थ में एक अपराध का आरोप समझा जाएगा :

परंतु ऐसी तारीखों में से प्रथम और अंतिम तारीख के बीच का समय एक वर्ष से अधिक नहीं होगा।
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25. सेना, नौसेना और वायुसेना संबंधी या अन्य विधियों का प्रभावित नहीं होना—(1) इस अधिनियम की कोई बात सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45), वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62), सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 (1968 का 47), तटरक्षक अधिनियम, 1978 (1978 का 30) और राष्ट्रीय सुरक्षक अधिनियम, 1986 (1986 का 47) के अधीन किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य अधिकारिता को, या उसको लागू होने वाली प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगी।
(2) शंकाओं के निराकरण के लिए घोषित किया जाता है कि ऐसी विधि के प्रयोजनार्थ जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, विशेष न्यायाधीश का न्यायालय सामान्य दांडिक न्याय का न्यायालय समझा जाएगा।
26. 1952 के अधिनियम 46 के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीशों का इस अधिनियम के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश होना—किसी क्षेत्र या किन्हीं क्षेत्रों के लिए दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952 के अधीन नियुक्त किया गया और इस अधिनियम के प्रारंभ पर पद धारण कर रहा प्रत्येक विशेष न्यायाधीश उस क्षेत्र या उन क्षेत्रों के लिए इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन नियुक्त किया गया विशेष न्यायाधीश समझा जाएगा और ऐसे प्रारंभ से ही प्रत्येक ऐसा न्यायाधीश, तदनुसार, ऐसे प्रारंभ पर उसके समक्ष लंबित सब कार्यवाहियों का निपटारा, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार करता रहेगा।
27. अपील और पुनरीक्षण—इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए उच्च न्यायालय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन, उच्च न्यायालय को प्रदत्त अपील और पुनरीक्षण की सभी शक्तियों का प्रयोग, जहां तक वे लागू हो सकती हैं, कर सकता है, मानो विशेष न्यायाधीश का न्यायालय उच्च न्यायालय की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला सेशन न्यायालय है।
28. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे न कि उसका अल्पीकरण करेंगे, और इसमें की कोई बात किसी लोक सेवक को किसी ऐसी कार्यवाही से छूट नहीं देगी जो, इस अधिनियम के अतिरिक्त, उसके विरुद्ध संस्थापित की जा सकती है।
29. 1944 के अध्यादेश सं० 38 का संशोधन—दंड विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 में,—
(क) धारा 2 की उपधारा (1), धारा 9 की उपधारा (1), धारा 10 के खंड (क) और धारा 11 की उपधारा (1) और धारा 13 की उपधारा (1) में “राज्य सरकार” शब्दों के स्थान पर, जहां भी वे आते हैं, यथास्थिति, “राज्य सरकार या केंद्रीय सरकार” शब्द रखे जाएंगे ;
(ख) धारा 10 के खंड (क) में “तीन मास” शब्दों के स्थान पर “एक वर्ष” शब्द रखे जाएंगे ;
(ग) अनुसूची के,—
(i) पैरा 1 का लोप किया जाएगा ;
(ii) पैरा 2 और पैरा 4 में,—
(क) “स्थानीय प्राधिकरण” शब्दों के पश्चात् “या किसी केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित कोई निगम, या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन या उसमे

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  1. ${ }^{1} 2018$ के अधिनियम सं० 16 की धारा 18 द्वारा प्रतिस्थापित।

    • 2001 के अधिनियम सं० 30 की धारा 2 और पहली अनुयूची द्वारा निरसित।