हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 2015

यह अधिसूचना हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 2015 को प्रस्तुत करती है। इन नियमों का उद्देश्य प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 के तहत अधिकरण के कामकाज को विनियमित करना है। इसमें आवेदन फाइल करने की प्रक्रिया, समय सीमा, दस्तावेजों की आवश्यकता, शुल्क, सुनवाई की प्रक्रिया और अधिकरण के अन्य प्रशासनिक पहलुओं को शामिल किया गया है। यह नियम अधिकरण के संचालन को सुव्यवस्थित करने और पक्षकारों के लिए प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए बनाए गए हैं।

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कार्यालय

EXTRAORDINARY

भाग II—खण्ड 3—उप-खण्ड (i) PART II—Section 3—Sub-section (i)

प्राधिकार से प्रकाशित PUBLISHED BY AUTHORITY

सं. 340] नई दिल्ली, मंगलवार, मई 26, 2015/नोस्ट 5,1937
No. 340] NEW DELHI, TUESDAY, MAY 26, 2015/JYAISTHA 5, 1937

कार्मिक लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय

(कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग)

अधिसूचना

नई दिल्ली, 26 मई, 2015

साः का.नि. 428(अ)—केंद्रीय सरकार, प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (1985 का 13) की धारा 35 की उप-धारा (2) के खंड (घ), खंड (ड) और खंड (च) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित नियम बनाती है, अर्थात्:-

  1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ—(1) इन नियमों का संक्षिप्त नाम हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 2015 है। (2) ये उनके राजपत्र में प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त होंगे।
  2. परिभाषा—इन नियमों में, –

(क) “अधिनियम” से प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (1985 का 13) अभिप्रेत है;

(ख) “अभिकर्ता” से किसी पक्षकार द्वारा अधिकरण के समक्ष उसकी ओर से कोई आवेदन, लिखित प्रत्युत्तर, उत्तर या कोई अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए सम्भवतः प्राधिकृत कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;

(ग) “आवेदक” से धारा 19 के अधीन अधिकरण को कोई आवेदन करने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है;

(घ) “प्रश्न” से इन नियमों से उपाबद्ध कोई प्रश्न अभिप्रेत है;

(ड) “विधिक व्यवसायी” का वही अर्थ होगा जो उसका अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) में है;

(च) “विधिक उत्तराधिकारी” से कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो विधि में मृतक व्यक्ति की संपदा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके अंतर्गत कोई व्यक्ति या एक अधिक व्यक्ति है जिनमें पेंशन, अधिवर्धिता, सीमांत या अन्य फायदे या कुटुंब पेंशन प्राप्त करने का अधिकार निहित है;


(ख) अधिकरण के संबंध में “रजिस्ट्रार” से प्रधान न्यायपीठ के लिए नियुक्त रजिस्ट्रार अभिप्रेत है, और अधिकरण की अन्य न्यायपीठों में से प्रत्येक के संबंध में नियुक्त रजिस्ट्रार अभिप्रेत है जिसमें नियम 28 के खंड (2) और खंड (3) के अधीन रजिस्ट्रार की शक्तियां और कृत्यों का प्रत्ययोजन किया जा सकेगा।
(ज) “रजिस्ट्री” से यथास्थिति, अधिकरण की या अधिकरण के न्यायपीठ की रजिस्ट्री अभिप्रेत है;
(स) “अंतरित आवेदन” से बाद या अन्य कार्यवाहियां अभिप्रेत हैं जिन्हें धारा 29 की उप-धारा (1) या उप-धारा (2) के अधीन अधिकरण को अंतरित कर दिया गया है ;
(घ) “अधिकरण” से अधिनियम की धारा 4 की उप-धारा (2) के अधीन स्थापित हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण अभिप्रेत है;
(ट) वे शब्द और पद जिनका इन नियमों में उपयोग किया गया है और परिभाषित नहीं हैं किंतु अधिनियम में परिभाषित हैं, का वही अर्थ होगा जो क्रमश: उनका अधिनियम में है।
2. अधिकरण की भाषा .- (1) अधिकरण की भाषा अंग्रेजी होगी :

परंतु अधिकरण के समक्ष किसी कार्यवाही में पक्षकार हिंदी में दस्तावेज फाइल कर सकेंगे, यदि वह ऐसी वांछा रखते हैं :
परंतु वह और कि न्यायपीठ –
(क) किसी कार्यवाही में हिंदी के उपयोग को अनुज्ञात कर सकेगा;
(ख) किसी अभिवचन या फाइल किए जाने वाले दस्तावेज के अंग्रेजी अनुवाद का निदेश दे सकेगा ;
(ग) अंतिम आदेश या तो हिंदी या अंग्रेजी में कर सकेगा।
(2) उपनियम (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जहां कोई अंतिम आदेश हिंदी में किया जाता है तो उसके प्राधिकृत अंग्रेजी अनुवाद को उसके साथ साथ तैयार किया जाएगा और अभिलेख में रखा जाएगा तथा पक्षकारों को नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाएगा।
4. आवेदन फाइल करने की प्रक्रिया.- (1) आवेदक द्वारा अधिकरण को कोई आवेदन प्ररूप 1 में व्यक्तिगत रूप से या किसी अभिकर्ता या सम्यकत: प्राधिकृत विधि व्यवसायी द्वारा रजिस्ट्रार को या रजिस्ट्रार द्वारा उन्हें प्राप्त करने के लिए प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी को प्रस्तुत किया जाएगा या उसे संबंधित न्यायपीठ के रजिस्ट्रार को सम्यकत: संबोधित पावती सहित रजिस्ट्रीकृत डाक से भेजा जाएगा।
(2) उपनियम (1) के अधीन आवेदन निम्नलिखित दो संकलनों में तीन प्रतियों में प्रस्तुत किया जाएगा –
(i) संकलन संख्या 1 – आक्षेपित आदेश, यदि कोई हो, के साथ आवेदन;
(ii) संकलन संख्या 2 – एक पेपर बुक के रूप में सभी अन्य दस्तावेज और उपाबंध जिन्हें आवेदन में निर्दिष्ट किया गया है।
(3) जहां प्रत्यर्थियों की संख्या एक से अधिक है वहां उतनी संख्या में आवेदन की पेपर बुक रुप में और प्रतियां प्रत्यर्थियों को अनुप्रयुक्त फाइल के आकार में लिफाफे में जिसमें प्रत्येक प्रत्यर्थी का पूरा पता हो आवेदक द्वारा प्रस्तुत की जाएगी :

परंतु जहां प्रत्यर्थियों की संख्या पांच से अधिक है, वहां रजिस्ट्रार आवेदक को प्रत्यर्थियों को सूचना जारी करने के समय आवेदन की और प्रतियां फाइल करने को अनुज्ञात कर सकेगा।
(4) आवेदक अपने आवेदन के साथ प्ररूप 2 में प्राप्ती स्लिप संलग्न और प्रस्तुत करेगा जिस पर रजिस्ट्रार द्वारा या रजिस्ट्रार की ओर से आवेदन प्राप्त करने वाले अधिकारी द्वारा आवेदन की प्राप्ति की अभिस्वीकृति के रुप में हस्ताक्षर किए जाएंगे।
(5) उपनियम (1) से उपनियम (3) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अधिकरण निम्नलिखित अनुज्ञात कर सकेगा, –
(क) यदि उसका प्रार्थना किए गए अनुतोय और इस बात के लिए कि उन सब का उस विषय में सामान्य हित है को ध्यान में रखते हुए हेतुक और बाद की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए एक से अधिक व्‍यक्तियों को एक साथ सामूहिक होने और एकल आवेदन फाइल करने के लिए, या
(ख) व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी संगम को जो एकल आवेदन में सम्मिलित होने की वांछा रखते है :
परंतु आवेदन में उन सभी व्यक्तियों के वर्ग या श्रेणी या प्रवर्गों का प्रकटन किया जाएगा जिनकी ओर से वह फाइल किया गया है :

परंतु यह और कि कम से कम एक प्रभावित व्यक्ति आवेदन में शामिल होता है।


  1. आवेदन का प्रस्तुतीकरण और संवीक्षा.- (1) रजिस्ट्रार या उसके द्वारा नियम 4 के उपनियम (1) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी प्रत्येक आवेदन पर उस तारीख को पृथ्दांकित करेगा जिसको वह प्रस्तुत किया गया हो या उस नियम के अधीन प्रस्तुत किया गया समज्ञा गया हो और पृथ्दांकन पर हस्ताक्षर करेगा।
    (2) यदि संवीक्षा पर आवेदन सही पाया जाए तो उसे सम्यकता रजिस्ट्रीकृत किया जाएगा और उसे एक क्रम संख्या प्रदान की जाएगी।
    (3) यदि संवीक्षा करने पर आवेदन त्रुटिपूर्ण पाया जाए और पाई गई त्रुटि औपचारिक प्रकृति की हो तो रजिस्ट्रार आवेदक को उसकी उपस्थिति में ठीक करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा और यदि उक्त त्रुटि अनौपचारिक प्रकृति की हो तो रजिस्ट्रार आवेदक को त्रुटि को सही करने के लिए 30 दिन की कालावधि अनुज्ञात कर सकेगा।
    (4) जब कोई आवेदन रजिस्ट्रीकृत डाक से प्राप्त होता है तो आवेदक को त्रुटियों से अवगत किया जाएगा, यदि कोई हो, और उससे उन्हें रजिस्ट्रार द्वारा आवेदक को सूचना की तारीख से 30 दिन से अनधिक कालावधि के भीतर ठीक करने की अपेक्षा होगी।
    (5) यदि आवेदक उपनियम (3) और उपनियम (4) के अधीन अनुज्ञात समय के भीतर त्रुटि को सुधारने में असफल रहता है तो रजिस्ट्रार आदेश द्वारा और कारणों को लेखबद्ध करते हुए आवेदन को रजिस्ट्र करने से इनकार कर सकेगा तथा समुचित आदेशों के लिए मामले को न्यायपीठ के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
  2. आवेदन फाइल करने का स्थान.- (1) साधारण रूप से कोई आवेदन किसी आवेदक द्वारा न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के पास फाइल किया जाएगा जिसकी अधिकारिता के भीतर –
    (i) आवेदक तत्समय के लिए तैनात है, या
    (ii) वाद हेतुक पूर्णतया या भागत: उत्पन्न हो :

परंतु अध्यक्ष की अनुमति से आवेदन प्रधान न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के पास फाइल किया जा सकेगा और धारा 25 के अधीन आदेशों के अधीन रहते हुए ऐसे आवेदन की सुनवाई और निपटान उस न्यायपीठ द्वारा किया जाएगा जिसकी उस मामले पर अधिकारिता है।
(2) उपनियम (1) में अन्तर्विष्ट किसी वाद के होते हुए भी वे व्यक्ति जो सेवानिवृत्ति, पदच्युति या सेवासमाप्ति के कारण सेवा में नहीं है को उनके विकल्प पर उस न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के पास जिसकी अधिकारिता के भीतर ऐसा व्यक्ति आवेदन फाइल करने के समय साधारणतया निवास कर रहा है, आवेदन फाइल कर सकेगा।
7. आवेदन फीस.- रजिस्ट्रार के पास फाइल किए गए प्रत्येक आवेदन के साथ 50/- रुपए की फीस संलग्न होगी जिसे संबंधित न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के पक्ष में राष्ट्रीयकृत बैंक पर आहरित रेखांकित मानदेय पत्र के माध्यम से चुकाया जाएगा और जो उस स्टेशन की मुख्य शाखा या बैंक में संदेह होगी जहां उक्त न्यायपीठ का स्थान अवस्थित है या उसका भुगतान संबंधित न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के पक्ष में आहरित रेखांकित भारतीय पोस्टल आर्डर द्वारा चुकाया जा सकेगा और जो उस स्टेशन के डाकघर में संदेय हो जहां अधिकरण अवस्थित है :

परंतु यह कि जहां अधिकरण एकल आवेदन को एक से अधिक व्यक्ति या किसी संगम द्वारा फाइल करने के लिए अनुज्ञात करता है संदेय की जाने वाली फीस 50/- रुपए होगी :

परंतु या और कि जहां अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि कोई आवेदन गरीबी के आधार पर विहित फीस का संदाय करने में असमर्थ है तो वह ऐसे आवेदक को फीस के संदाय से छुट प्रदान कर सकेगा।
8. आवेदन की अन्तर्वस्तु.- (1) इन नियमों के अधीन फाइल किया गया प्रत्येक आवेदन सुभिन्न शीर्षों के अधीन सुस्पष्ट रूप से आवेदन के आधारों को रखेगा और आधारों की सतर्क रूप से संख्यांकित किया जाएगा।
(2) प्रत्येक आवेदन जिसके अन्तर्गत प्रकीर्ण आवेदन भी है को अच्छी क्वालिटी के मोटे कागज में एक तरफ दोहरे अन्तराल में टाइप किया जाएगा।
(3) अन्तरिम आदेश या निदेश प्राप्त करने के लिए पृथक आवेदन प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं होगा यदि मूल आवेदन में उसके लिए प्रार्थना की गई है।
(4) इन नियमों के अधीन आवेदन फाइल करने के पश्चात् कोई आवेदक अन्तरिम आदेश या निदेश के लिए आवेदन कर सकेगा और आवेदन प्ररूप 3 में होगा।
(5) जहां कोई आवेदक विलंब माफी के लिए आवेदन करता है तो वह शपथपत्र द्वारा समर्थित एक पृथक आवेदन फाइल करेगा।
9. आवेदन के साथ संलग्न किए जाने वाले दस्तावेज – (1) प्रत्येक आवेदन के साथ निम्नलिखित दस्तावेज संलग्न किए जाएंगे, अर्थात् :-
(i) उस आदेश की सत्यापित सही प्रति जिसके विरुद्ध आवेदन फाइल किया गया है।


(ii) उन दस्तावेजों की प्रतियां जिन पर आवेदक निर्भर करता है और जिन्हें आवेदन में निर्दिष्ट किया गया है।
(iii) दस्तावेजों की क्रम-सूची।
(2) उपनियम (1) में निर्दिष्ट दस्तावेज या तो आवेदक द्वारा स्वयं सत्यापित होंगे या किसी विधिक व्यवसायी द्वारा सत्यापित होंगे और प्रत्येक दस्तावेज को उपाबंध क1, क2, क3 और इसी प्रकार क्रमश संख्यक रूप से चिन्हित किया जाएगा।
(3) जहां कोई आवेदन किसी अभिकर्ता द्वारा फाइल किया गया है, उसे अभिकर्ता के रूप में कृत्य करने के लिए प्राधिकृत करने वाले दस्तावेजों को भी आवेदन के साथ उपाबद्ध किया जाएगा :

परंतु जब कोई आवेदन किसी विधिक व्यवसायिक द्वारा फाइल किया गया है तब उसके साथ सम्यक् रूप से निष्पादित वकालतनामा संलग्न होगा।
10. बहुलक उपचार – कोई आवेदन एकल कार्रवाई हेतुक पर आधारित होगा और वह एक से अधिक अनुतोषों की ईप्सा कर सकेगा जब वे एक दूसरे के पारिणामिक हों।
11. सूचना की तामिल और अधिकरण द्वारा जारी प्रक्रियाएं – (1) अधिकरण द्वारा जारी की जाने वाली सूचनाओं की निम्नलिखित में से किसी एक रीति द्वारा तामिल की जा सकेगी ;
(i) पक्षकार द्वारा एक अभिस्वीकृति के साथ स्वयं तामिल और तामिल का एक शपथपत्र ;
(ii) प्रक्रिया सेवक द्वारा दस्ती सुपुर्दगी ;
(iii) सम्यक् अभिस्वीकृति के साथ रजिस्टर डाक द्वारा ;
(iv) संबंधित विभागाध्यक्ष द्वारा खंड (i) से खंड (iii) में निर्दिष्ट किसी एक या अधिक रीतियों द्वारा :

परंतु यदि अधिकरण तामिल की रीति को विनिर्दिष्ट नहीं करता तो सूचना सम्यक् अभिस्वीकृति के साथ रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा भेजी जा सकेगी और सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (1908 का 5) की पहली अनुसूची के आदेश 5 के नियम 19क के उपनियम (2) के उपबंध तामिल की रीति को लागू होंगे।
(2) उपनियम (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अधिकरण प्रत्यर्थियों की संख्या को और उनके निवास के या कार्य के स्थानों और अन्य परिस्थितियों को गणना में लेते हुए निदेश दे सकेगा कि आवेदन की सूचना की तामिलं प्रत्यर्थियों पर किसी अन्‍य रीति में, जिसके अन्तर्गत तत्स्थानी तामिल की कोई रीति जैसा अधिकरण को न्यायोचित और सुविधाजनक प्रतीत हो, की जाए।
(3) उपनियम (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अधिकरण मामले की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार के किसी विभाग या संगठन या किसी प्राधिकारी, किसी नियम, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निकाय के लिए तामिल को स्वीकार करने के लिए स्थायी काउंसेल को सूचना की तामिल का निदेश दे सकेगा।
(4) अधिकरण द्वारा जारी प्रत्येक सूचना जब तक कि अन्यथा आदेश न किया जाए आवेदन की एक प्रति और आक्षेपित आदेश की एक प्रति के साथ होगी।
(5) प्रत्येक आवेदक किसी आवेदन की बाबत जहां प्रत्यर्थी पांच से अधिक है प्रक्रिया के निष्पादन की तामिल के लिए एक फीस का संदाय करेगा, जैसा कि नीचे दिया गया है :-
(i) पांच प्रत्यर्थियों से अधिक प्रत्येक प्रत्यर्थियों के लिए पांच रुपए की राशि ; या
(ii) जहां तमिल ऐसी रीति में है जैसा अधिकरण उपनियम (1) के अधीन निदेश करे, ऐसी राशि जो तमिल के खंड एक को प्रभावी करने के लिए उपगत वास्तविक व्यय से अनधिक है जैसा अधिकरण विहित करे।
(6) उपनियम (2) के अधीन तामिल या प्रक्रिया के निष्पादन के लिए फीस नियम 7 में विहित रीति में फीस के अवधारण के लिए आदेश की तारीख से एक सप्ताह के भीतर या ऐसे विस्तारित समय जैसा रजिस्ट्रार अनुज्ञात करे जमा की जाएगी।
(7) उपनियम (1) से उपनियम (3) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि सभी प्रत्यर्थियों पर सूचना की तामिल करना युक्तियुक्त रूप से व्यवहार्य नहीं है तो वह कारणों को लेखबद्ध करते हुए, निदेश दे सकेगा कि इस बात के होते हुए भी कि आवेदन की सूचना की तामिल नहीं की गई है, आवेदन की सुनवाई की जाएगी :
परंतु तब तक किसी आवेदन की सुनवाई नहीं की जाएगी जब तक –
(i) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को आवेदन की सूचना की तामिल न कर दी गई हो, यदि ऐसी सरकार प्रत्यर्थी है ;


(ii) उस प्राधिकारी को आवेदन की सूचना को तामिल नहीं कर दी गई है जिसने उस आदेश को पारित किया था जिसके विरुद्ध आवेदन फाइल किया गया है; और
(iii) अधिकरण का यह समाधान हो गया है कि उन प्रल्यर्थियों का हित जिनको आवेदन की सूचना की तामिल नहीं की गई है तब तक पूरा नहीं होगा जब तक उनका उन प्रल्यर्थियों द्वारा यथेष्ट और पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व न कर लिया जाए जिन पर आवेदन की सूचना की तामिल कर दी गई है।
12. प्रत्यर्थियों द्वारा प्रत्युत्तर और अन्य दस्तावेजों का फाइल किया जाना – (1) प्रत्येक अभ्यर्थी जो आवेदन का प्रतिवाद की वांछ्या रखता है आवेदन का प्रत्युत्तर तीन प्रतियों में और उन दस्तावेजों को जिन पर वह निर्भर करता है रजिस्ट्री के पास एक पेपर पुस्तिका के रूप में उसे आवेदन की सूचना के तामिल के एक मास के भीतर फाइल करेगा।
(2) उपनियम (1) में फाइल किए गए प्रत्युत्तर में, प्रत्यर्थी विनिर्दिष्ट रूप से आवेदक द्वारा उसके आवेदन कथित तथ्यों को स्वीकार करेगा, अस्वीकार करेगा या उनका स्पष्टीकरण देगा और ऐसे अन्य अतिरिक्त तथ्यों का भी कथन कर सकेगा जो मामले में विनिम्न्य के लिए आवश्यक पाए जाएं।
(3) प्रत्युत्तर पर प्रत्यर्थी द्वारा या उसके द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के नियम 15 के आदेश 6 में यथाउपबंधित रीति में लिखित में उसके द्वारा सम्यकत: प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा लिखित कथन के रूप में हस्ताक्षरित और सत्यापित की जाएगी।
(4) उपनियम (1) में निर्दिष्ट दस्तावेजों को प्रत्युत्तर के साथ भी फाइल किया जाएगा और उन्हें आर-1, आर-2, आर-3 और इसी प्रकार निस्त्रांकित किया जाएगा।
(5) प्रत्यर्थी उपनियम (1) में यथावर्णित दस्तावेजों के साथ प्रत्युत्तर की एक प्रति की, यथास्थिति आवेदक या उसके अभिकर्ता या विधिक व्यवसायी को तामिल करेगा और तामिल के सबूत को रजिस्ट्री में फाइल करेगा।
(6) अधिकरण विहित अवधि के अवसान के पश्चात् प्रत्युत्तर फाइल करने को अनुज्ञात कर सकेगा।
(7) अधिकरण पक्षकारों को अभिवचन को संशोधित करने के लिए उसी रीति में जैसी सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश 6 , नियम 17 में उपबंधित है, अनुज्ञात कर सकेगा।
13. सुनवाई की तारीख और स्थान का अधिसूचित किया जाना – अधिकरण पक्षकारों को आवेदन की सुनवाई की तारीख और स्थान को ऐसी रीति में अधिसूचित करेगा जैसा अध्यक्ष साधारण विशेष आदेश द्वारा विदेश करे।
14. अधिकरण की बैठक – अधिकरण साधारणतया शिमला में अपनी बैठके करेगा :

परंतु यदि किसी समय अधिकरण के अध्यक्ष का यह समाधार हो जाता है ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जो अधिकरण की बैठकों को शिमला से भिन्न किसी स्थान पर करना आवश्यक बनाती है तो वह हिमाचल प्रदेश में किसी अन्य समुचित स्थान पर बैठके करने का विदेश दे सकेगा।
15. मामलों का कैलेण्डर – (1) प्रत्येक न्यायपीठ अंतरित मामलों का कैलेण्डर बनाएगी और जहां तक संभव हो मामलों की सुनवाई और विनिम्न्य कैलेण्डर के अनुसार करेगी।
(2) प्रत्येक आवेदन की सुनवाई और विनिम्न्य जहां तक संभव हो उसके रजिस्ट्रीकरण की तारीख से छह मास के भीतर किया जाएगा।
(3) अधिकरण को स्थगन आदेश को मना करने की और मौखिक तर्क को सीमित करने की भी शक्ति होगी।
16. आवेदक के व्यतिक्रम के लिए आवेदन पर कार्रवाई – (1) किसी आवेदन की सुनवाई के लिए नियत तारीख को या किसी अन्य तारीख को जिसको ऐसी सुनवाई का स्थगित कर दिया गया है आवेदक तब उपस्थित नहीं होता है जब आवेदन पर सुनवाई की जानी है, अधिकरण अपने स्व-विवेक पर या तो व्यतिक्रम के लिए आवेदन को खारिज कर सकेगा या गुणगुण के आधार पर सुनवाई और विनिम्न्य कर सकेगा।
(2) जब किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज कर दिया गया है और आवेदक ने खारिज करने की तारीख से 30 दिन की अवधि के भीतर आवेदन फाइल किया है और अधिकरण का वह समाधान कर दिया है कि जब आवेदन पर सुनवाई की जानी थी तब उसके अनुपस्थित होने के पर्याप्त कारण थे, अधिकरण आवेदन को खारिज करने को अपास्त करने का आदेश करेगा और आवेदन को पुन: बहाल करेगा :

परंतु मामले को गुणगुण के आधार पर निपटाए जाने की दशा में विनिम्न्य पर सिवाय पुनरीक्षण के पुन: विचार नहीं किया जाएगा।


  1. एकपक्षीय सुनवाई और आवेदन का निपटान – (1) जब आवेदन की सुनवाई के लिए नियत तारीख को या किसी अन्य तारीख को जिसके लिए सुनवाई स्थगित की जा सकेगी आवेदक उपस्थित होता है और प्रत्यर्थी तब उपस्थित नहीं होता है जब आवेदन पर सुनवाई की जानी है तब अग्रिकरण सुनवाई को स्थगित करे सकेगा या आवेदन पर एकपक्षीय रूप से विनिम्रय कर सकेगा।
    (2) जब किसी आवेदन पर किसी प्रत्यर्थी या प्रत्यर्थियों के विरुद्ध एकपक्षीय रूप से सुनवाई की गई है, तब प्रत्यर्थी आदेश की तारीख से 30 दिन के भीतर अग्रिकरण को उसे अपास्त करने का आदेश करने के लिए आवेदन कर सकेंगे और यदि प्रत्यर्थी अग्रिकरण का वह समाधान कर देते हैं कि सूचना की सम्यकता तामिल नहीं की गई थी या उन्हें किसी पर्याप्त कारण से उपस्थित होने से निवारित किया गया था जब आवेदन पर सुनवाई की जानी थी तो अग्रिकरण उनके विरुद्ध एकपक्षीय आदेश को ऐसे निबंधनों पर जो वह उचित समक्षे अपास्त करने का आदेश कर सकेगा और आवेदन पर कार्यवाही करने के लिए किसी दिन को नियत कर सकेगा :

परंतु किसी आवेदन पर एकपक्षीय आदेश ऐसी प्रकृति का है कि इसे केवल एक प्रत्यर्थी के विरुद्ध अपास्त नहीं किया जा सकता है तो इसे सभी या किन्हीं अन्य प्रत्यर्थियों के विरुद्ध भी अपास्त किया जा सकेगा :
परंतु वह और कि नियम 11 के उपनियम (7) के अधीन आने वाले मामलों की दशा में अग्रिकरण केवल इस आधार पर किसी आवेदन पर किए गए एकपक्षीय आदेश को अपास्त नहीं करेगा कि इसकी प्रत्यर्थी या प्रत्यर्थियों पर तामिल नहीं की गई थी।
18. पुनरीक्षण के लिए आवेदन – (1) पुनरीक्षण के लिए इसी आवेदन पर कार्रवाई नहीं की जाएगी यदि उसे उस आदेश जिसके विरुद्ध पुनरीक्षण की ईप्स की गई है, की प्रति के प्राप्त होने की तारीख से 30 दिन के भीतर फाइल नहीं किया गया है।
(2) साधारणतया किसी पुनरीक्षण आवेदन की सुनवाई उसी न्यायपीठ द्वारा की जाएगी जिसमें आदेश पारित किया है, सिवाय यदि अध्यक्ष कारणों को लेखबद्ध करते हुए उसकी किसी अन्य न्यायपीठ द्वारा सुनवाई का आदेश न दे।
(3) संबंधित न्यायपीठ द्वारा सिवाय अन्यथा उपबंधित के किसी पुनरीक्षण आवेदन का निपटान परिचालन द्वारा किया जाएगा और न्यायपीठ या तो आवेदन को खारिज कर देगा या विरोधी पक्ष को सूचना का निदेश देगा।
(4) जब किसी निर्णय या आदेश के पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है और उसका निपटान कर दिया गया है तो उसी रीति में पुनरीक्षण के लिए किसी और आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा।
(5) तब तक पुनरीक्षण के लिए किसी आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा जब तक वह सम्यकत: शपथपत्र द्वारा समर्थित न हो जिसमें जानकारी के स्रोत, वैयक्तिक या अन्यथा और वह आधार भी अन्तर्विष्ट हों जो विधिक सलाह पर आधारित हों।
(6) पुनरीक्षण आवेदन को भी प्रति शपथपत्र द्वारा सम्यकत: ग्रहण किया जाएगा जब किसी तथ्य का पालन विवादित हो।
19. विधिक प्रतिनिधियों का प्रतिस्थापन – (1) अग्रिकरण के समक्ष कार्यवाहियों के लंबन के दौरान किसी पक्षकार के मृत्यु की दशा में मृतक पक्षकार के विधिक प्रतिनिधि मृत्यु की तारीख से 90 दिन के भीतर आवश्यक पक्षकार के रूप में अभिलेख पर लाए जाने के लिए आवेदन कर सकेंगे।
(2) जब उपनियम (1) में विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर विधिक प्रतिनिधि से कोई आवेदन प्राप्त नहीं होता है तो मृतक पक्षकार के भीतर कार्यवाहियों का उपशम हो जाएगा :

परंतु अच्छे और पर्याप्त कारणों पर अग्रिकरण किसी आवेदन पर उपशमन के आदेश को अपास्त कर सकेगा और विधिक प्रतिनिधियों का प्रतिस्थापन कर सकेगा।
20. सुनवाई का स्थगत – अग्रिकरण यदि सुनवाई के किसी प्रक्रम पर पर्याप्त कारण उपदर्शित किए जाएं तो पक्षकारों को या उनमें से किसी पक्षकार को समय अनुदत्त कर सकेगा तथा आवेदन की सुनवाई को स्थगित कर सकेगा और अग्रिकरण स्थगन द्वारा कारित लागत की बाबत ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समक्षे।
21. आदेश पर हस्ताक्षर किया जाना और तारीख लिखा जाना – (1) अग्रिकरण के प्रत्येक आदेश पर न्यायपीठ का गठन करने वाले सदस्य या सदस्यों जिन्होंने आदेश सुनाया है द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे।
(2) आदेश को न्यायालय में सुनाया जाएगा।
22. आदेशों का प्रकाशन – (1) अग्रिकरण अपने उस विनिम्रय को, जिसे वह प्रकाशन के लिए उचित समक्षे, “भारतीय विधि रिपोर्ट केन्द्रीय प्रशासनिक अग्रिकरण …… 20 ……” (संक्षेप में आईएलआर … सीएटी … 20 …) में प्रकाशित कर सकेगा।


(2) अधिकरण के ऐसे आदेश जिन्हें वे किसी अन्य प्राधिकृत रिपोर्ट या प्रेस में प्रकाशन के लिए उचित समझे को ऐसे निर्बझनों और शर्तों पर प्रकाशन के लिए निर्मुक्त किया जाएगा जो अध्यक्ष साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे।
23. आदेश की पक्षकारों को संयूषना – (1) अंतरिम अनुतोष अनुदत्त करने वाला या उससे इनकार या उसे उपांतरित करने वाला प्रत्येक अंतरिम आदेश और अंतिम आदेश को आवेदक को और संबंधित प्रत्यर्थी या उनके काउंसलों को दस्ती सुपुर्दती या ढाक द्वारा नि:शुल्क संयूषित किया जाएगा :
परंतु सिवाय न्यायपीठ द्वारा अन्यथा आदेश किए जाने के अंतिम आदेश की एक प्रति किसी प्रत्यर्थी को नहीं भेजी जाएगी जिसने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं की है।
24. विधिक व्यवसायी के लिपिकों का रजिस्ट्रीकरण – (1) कोई विधिक व्यवसायी जो अपने लिपिक के रजस्ट्रीकरण की वांछ्या रखता है रजिस्ट्रार को प्ररूप 4 में आवेदन करेगा और ऐसा आवेदन अनुज्ञात करने पर, रजिस्ट्रार, उसके नाम को लिपिकों के रजिस्टर में दर्ज करेगा।
(2) रजिस्ट्रार, लिपिक के नाम का रजिस्ट्रीकरण करने के पश्चात् उसे एक पहचान पत्र जारी करने का निदेश देगा जो अहस्तांतरणीय होगा तथा धारक को अधिकरण के किसी अधिकारी या इस निमित्त प्राधिकृत अन्य कर्मचारी द्वारा अनुरोध किए जाने पर उसे प्रस्तुत किया जाएगा तथा पहचान पत्र को संबंधित न्यायपीठ के उपरजिस्ट्रार के हस्ताक्षर के अधीन जारी किया जाएगा।
(3) उपनियम (2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सभी लिपिकों का रजिस्टर प्रत्येक न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के कार्यालय में रखा जाएगा।
(4) किसी एक समय कोई विधिक व्यवसायी दो से अनधिक रजिस्ट्रीकृत लिपिक रख सकेगा जब कि प्रत्येक न्यायपीठ के रजिस्ट्रार द्वारा अन्यथा अनुज्ञात न किया जाए।
(5) जब कोई विधिक व्यवसायी किसी रजिस्ट्रीकृत लिपिक को नियोजित करना बंद कर देता है तो वह इस तथ्य से रजिस्ट्रार को तुरंत रजिस्ट्री द्वारा उसके लिपिक को जारी पहचान पत्र को संलग्न करके पत्र द्वारा अधिसूचित करेगा तथा पत्र की प्राप्ति पर उक्त रजिस्ट्रीकृत लिपिक का नाम रजिस्टर से हटा दिया जाएगा।
25. अभिलेखों के निरीक्षण के लिए कोई फीस नहीं – किसी लंबित आवेदन में किसी पक्षकार द्वारा अभिलेखों के निरीक्षण के लिए कोई फीस प्रभारित नहीं की जाएगी।
26. कतिपय मामलों में आदेश और निदेश – अधिकरण प्रभावी करने के लिए या अपने आदेशों के संबंध में या उसकी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए या न्याय करने के लिए ऐसे आदेश या निदेश दे सकेगा जो वह आवश्यक या समीचीन समझे।
27. अधिकरण का कार्यसमय – सिवाय रविवार और अन्य सार्वजनिक अवकाशों के अधिकरण का कार्यालय अध्यक्ष द्वारा किए गए किसी आदेश के अधीन रहते हुए पूर्वाहन 10.00 बजे से अपराहन 5.00 बजे तक खुला रहेगा।
28. अधिकरण की बैठक का समय – अधिकरण की बैठक का समय (अवकाश न्यायपीठ सहित) अध्यक्ष द्वारा किए गए साधारण या किसी विशेष आदेश के अधीन रहते हुए साधारणतया पूर्वाहनन 10.30 बजे से अपराहन 1.30 बजे और अपराहन 2.30 बजे से अपराहनन 5.00 बजे तक होगा।
29. रजिस्ट्रार की शक्तियां और कृत्य – (1) रजिस्ट्रार के पास अधिकरण के अभिलेखों की अभिरक्षा होगी और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगा जो उसे संबंधित न्यायपीठ के अध्यक्ष या सदस्य द्वारा इन नियमों के अधीन पृथक् आदेश द्वारा समनुदेशित किए जाए।
(2) रजिस्ट्रार अध्यक्ष के अनुमोदन से सहायक रजिस्ट्रार की इन नियमों के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा किए जाने वाले किसी कृत्य या निर्वहन की जाने वाली किसी शक्ति को सहायक रजिस्ट्रार की प्रदत्त कर सकेगा।
(3) रजिस्ट्रार की अनुपस्थिति में, सहायक रजिस्ट्रार या कोई अन्य अधिकारी जिसे यथास्थिति अध्यक्ष द्वारा रजिस्ट्रार की शक्तियां और कृत्य प्रदत्त किए गए हैं, रजिस्ट्रार की शक्तियों और कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा।
(4) शासकीय मुद्रा रजिस्ट्रार की अभिरक्षा में रखी जाएगी।
(5) अध्यक्ष के किसी साधारण या विशेष निदेश के रहते हुए, अधिकरण की मुद्रा सिवाय रजिस्ट्रार या सहायक रजिस्ट्रार के लिखित प्राधिकार के अधीन किसी आदेश, समन या अन्य कार्यवाही पर चस्पा नहीं की जाएगी।
(6) अधिकरण की मुहर अधिकरण द्वारा जारी किसी प्रमाणित प्रति पर सिवाय रजिस्ट्रार या सहायक रजिस्ट्रार के लिखित प्राधिकार


के चरमा नहीं की जाएगी।
30. रजिस्ट्रार की अतिरिक्त शक्तियां और कर्तव्य – इन नियमों में अन्यष प्रदत्त शक्तियों के अतिरिक्त, रजिस्ट्रार के अध्यक्ष के किसी साक्षारण या विशेष आदेश के रहते हुए निम्नलिखित शक्तियां और कर्तव्य होंगे, अर्थात्
(i) किसी अंतिरित आवेदन सहित प्रत्येक आवेदन या अन्य दस्तावेज प्राप्त करना ;
(ii) रजिस्ट्रीकरण से पूर्व किसी आवेदन की संवीक्षा से उद्धृत प्रत्येक प्रश्न का विनिश्चय करना ;
(iii) अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किसी आवेदन पर अधिनियम और नियमों के अधीन संशोधन की अपेक्षा करना ;
(iv) आवेदन की पहली सुनवाई या अन्य कार्यवाहियों की तारीख नियत करना और न्याय के निदेशों के अधीन रहते हुए उसकी सूचना जारी करना ;
(v) अभिलेखों का कोई औपचारिक संशोधन करने का निदेश देना ;
(vi) कार्यवाहियों में पक्षकारों की किसी दस्तावेज की प्रतियां अनुदत्त करने का निदेश देना ;
(vii) अधिकरण के अभिलेखों का निरीक्षण करने की अनुमति प्रदान करने ;
(viii) सूचनाओं की तामिल या अन्य कार्यवाहियों, नई सूचना जारी करने के आवेदनों या आवेदन फाइल करने के लिए समय का विस्तार करने से संबंधित किसी मामले का निपटान करना, कोई उत्तर या प्रत्युत्तर, यदि कोई हो, फाइल करने के लिए 30 दिन से अनधिक समय अनुदत्त करना और पूर्वोक्त कालावधि के अवसान के पश्चात्त्त समुचित आदेशों के लिए न्यायपीठ के समक्ष मामलों को रखना।
(ix) किसी न्यायालय मा अन्य प्राधिकारी की अभिरक्षा से अभिलेखों की मंगाना ;
(x) आवेदन के लंबन के दौरान मृतक पक्षकारों के विधिक प्रतिनिधियों को प्रतिस्थापित करने के लिए मृत्यु की तारीख से 90 दिन के भीतर आवेदन प्राप्त करना ;
(xi) प्रतिस्थापन के लिए सिवाय वहां जहां प्रतिस्थापन में दुष्प्रेरण के किसी आदेश को अपास्त करना अंतर्वर्तित नहीं है, आवेदनों को प्राप्त करना और उनका निपटान करना ; और
(xii) दस्तावेजों को वापस करने के लिए पक्षकारों के आवेदनों को प्राप्त करना और उनका निपटान करना।
31. प्रधान न्यायपीठ के रजिस्ट्रार की अतिरिक्त शक्तियां – प्रधान न्यायपीठ के रजिस्ट्रार को समय-समय पर अध्यक्ष द्वारा जारी साक्षारण विशेष आदेशों के अधीन अन्य न्यायपीठों की रजिस्टरी का निरीक्षण करने या निरीक्षण कारित करने और सूचना और अभिलेखों की मंगाने की शक्ति होगी।
32. मुद्रा और प्रतीक – अधिकरण की शासकीय मुद्रा और प्रतीक वे होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं।
33. अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारियों का परिधान – अधिकरण के सदस्यों (जिसके अन्तर्गत अध्यक्ष है) और कर्मचारीवृंद का परिधान वह होगा जो अध्यक्ष द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए।
34. पक्षकारों का परिधान – यथास्थिति कोई विधिक व्यवसायी या प्रस्तुती अधिकारी अधिकरण के समक्ष अपने व्यवसायिक परिधान यदि कोई हो, में उपस्थित होगा यदि ऐसा कोई परिधान नहीं है तो, –
(i) पुरुष की दशा में बंद कॉलर का कोट और पैंट या किसी लॉउंज सूट में ;
(ii) महिला की दशा में साढ़ी या हल्के रंग के किसी अन्य पारंपरिक परिधान में।


प्ररूप 1 [नियम 4] प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 19 के अधीन आवेदन हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण में मामले का नाम : $\qquad$ न्यायपीठ

क्रम सूची

क्रम सं. उन दस्तावेजों का विवरण जिन पर निर्भर किया गया है पृष्ठ संख्या
1. आवेदन
2.
3.
4.
5.
6. आवेदक के हस्ताक्षर

अधिकरण के कार्यालय में उपयोग के लिए

फाइल करने की तारीख या डाक द्वारा प्राप्ति की तारीख रजिस्ट्रीकरण संख्या रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर

हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण में क. ख. (पुत्र, का निवासी और नियोजन का स्थान या अंतिम नियोजन जैसा विवरण जोड़े)

आवेदक

  • और

ग. घ. (विवरण जोड़े और निवास या कार्यालय का पता जिस पर सूचना की तामिल प्रत्यर्थी या प्रत्यर्थियों पर की जानी है। प्रत्येक प्रत्यर्थी के ब्यौरे अनुक्रमिक रूप में दिए जाने हैं।

प्रत्यर्थी

आवेदन के ब्यौरे :

  1. उस आदेश की विशिष्टियां जिसके विरुद्ध आवेदन किया गया है (आदेश के ब्यौरे जैसे संख्या, तारीख और वह प्राधिकारी जिसने आदेश पारित किया है जिसके विरुद्ध आवेदन किया गया है कि विशिष्टियां) ।

  1. अधिकरण की अधिकारिता :

आवेदक घोषणा करता है कि उस आदेश कि विषयवस्तु जिसके विरुद्ध राहत चाहता है अधिकरण के क्षेत्राधिकार के भीतर है।

  1. समय सीमा :

आवेदक यह और घोषणा करता है कि आवेदन प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 21 में विहित समय सीमा कालावधि के भीतर है।

  1. मामले के तथ्य :

(यहां अनुक्रमिक रूप से तथ्यों का संक्षिप्त विवरण दें, जहां तक संभव हो प्रत्येक पैरा में पृथक्क मुद्दा या तथ्य अन्तर्विष्ट होगा)।

  1. विधिक उपबंधों के साथ राहत के आधार :

  2. उन उपचारों के ब्यौरे जो ले लिए गए हैं :

आवेदक घोषणा करता है उसने वे सभी उपचार जो सुसंगत सेवा नियमों आदि के अधीन उसे उपलब्ध है, का उपयोग कर लिया है। (यहां अनुक्रमिक रूप से किए गए अध्यावेदनों के ब्यौरों और उसके समर्थन में उपार्धध्र की संख्या को निर्दिष्ट करते हुए ऐसे अध्यावेदनों का परिणाम दें)

  1. वह मामला जो पूर्व में फाइल नहीं किया गया है या किसी न्यायालय के पास लंबित नहीं है ;

आवेदक यह और घोषणा करता है कि उसने उस विषय की बाबत किसी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकारी या अधिकरण की किसी अन्य न्यायपीठ में पूर्व में कोई आवेदन, रिट याचिका या वाद फाइल नहीं किया है जिसके संबंध में ये आवेदन किया गया है और न ही ऐसा आवेदन, रिट याचिका या वाद उनमें से किसी के समक्ष लंबित है।

आवेदक द्वारा पूर्व में ऐसा आवेदन, रिट याचिका या सूट फाइल किए जाने की दशा में, वह प्रक्रम जिस पर वह लंबित है और यदि विनिश्चय किया गया है तो उसके समर्थन में दिए जाने वाले उपाबद्ध की संख्या को निर्दिष्ट करते हुए विनिश्चयों की सूची दें।

  1. ईप्सा की गई राहत :

ऊपर पैरा 6 में वर्णित तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए आवेदक निम्नलिखित राहत (तो) की प्रार्थना करता है :—

(नीचे ईप्सा की गई राहत को, ऐसी राहत के आधारों को स्पष्ट करते हुए और विधिक उपबंधों, यदि कोई है, जिन पर निर्भर किया गया है, वित्ति निर्दिष्ट करें)

  1. अंतरिम आदेश, यदि कोई है जिसके लिए प्रार्थना की गई है :

आवेदन के अंतिम विनिश्चय के लंबन के दौरान आवेदक निम्नलिखित अंतरिम राहत की वांछा करता है : (यहां प्रार्थित अंतरिम राहत की प्रकृति दें)

  1. आवेदन के रजिस्ट्रीकृत डाक से भेजे जाने की दशा में यह कथन किया जाए कि आवेदक अनुमति प्रक्रम पर मौखिक सुनवाई की इच्छा रखता है तो वह उसके साथ स्वयं का पता लिखा पोस्टकार्ड या अभिस्वीकृति कार्ड उपाबद्ध करे जिसके माध्यम से सुनवाई की तारीख के संबंध में उसे सूचना भेजी जा सके।

  2. आवेदन फीस के संबंध में बैंक ड्राफ्ट/पोस्टल आर्डर की विशिष्टियां।

  3. संलग्नकों की सूची

1.

2.

3.

4.

सत्यापन

| मैं …………………….. (आवेदक का नाम) पुत्र/पुत्री/पत्नी …………………………….. आयु …………. के रूप में …………………….. के कार्यालय में कार्यरत …………………….. निवासी एतद् द्वारा …………………….. पैरा …………………….. से पैरा ……………. तक को सत्यापित करती हूं कि वे मेरी वैयक्तिक जानकारी के अनुसार सत्य हैं और ……………… पैरा ……………….. से पैरा ……………….. के, विधिक सलाह के अनुसार मुझे सत्य होने का विश्वास है और मैंने किसी तात्विक तथ्य को छिपाया नहीं है। | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | | |


प्रकाश 2 [नियम 4(4)] हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण में ……………………….न्यायपीठ

प्राप्ति पर्ची केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण न्यायपीठ में श्री/कुमारी/श्रीमती मंत्रालय/विभाग/कार्यालय में निवासी के आवेदन की अभिस्वीकृति दी जाती है।

कुते रजिस्ट्रार

तारीख हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण
मुद्रा : ………….. न्यायपीठ

प्रकाश 3 [नियम 8(3)] हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण में न्यायपीठ का प्रकीर्ण आवेदन सं. की मूल/अंतरित आवेदन सं. आवेदक/याची बनाम प्रत्यर्थी/आवेदक में आवेदन करने के संक्षिप्त तथ्य राहत या प्रार्थना सत्यापन मैं ………… (आवेदक का नाम) पुत्र/पत्नी/पुत्री आयु के रूप में के कार्यालय में कार्यरत निवासी एतद् द्वारा पैरा पैरा ………………. के के की सत्यापित करती हूं कि वे मेरी वैयक्तिक जानकारी के अनुसार सत्य है और ………………. पैरा ………………. से पैरा ………………. के, विधिक सलाह के अनुसार मुझे सत्य होने का विश्वास है और मैंने किसी तात्विक तथ्य को छिपाया नहीं है।

तारीख आवेदक के हस्ताक्षर
स्थान
अधिवक्ता/अभिकर्ता के हस्ताक्षर

[नियम 2(2)]

हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक अधिकरण में लिपिक के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….